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| पृष्ठ कथा |
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| पिछले कुछ दशकों में भारत एक के बाद एक आई आपदाओं से इस कदर आहत और क्षत-विक्षत हुआ है कि उसे संभलने का अवसर ही नहीं मिल सक |
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अग्र लेख
जीवन, संपति और संरचनाओं का सरंक्षण
राष्टिय आपदा प्रबंधन प्रधिकरण (एनङीएमए) के उपाध्यक्ष के साथ योजना की बातचीत के अंश
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| Articles |
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मुक्त व्यापार समझौते और भारत
विपुल चटर्जी
जोसेफ जार्ज
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अनेक देश मुक्त व्यापार समझौतों ...
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भारत का हस्तशिल्प निर्यात
विजय ठाकुर |
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भारत का हस्तशिल्प क्षेत्र जो ग्रामीण ...
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भारत से निर्यात संभावनाएं
संजय तिवारी |
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दुनिया की उभरती अर्थव्यवस्था...
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कृषि निर्यात
संदीप दास
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साधारण शुरुआत के बाद भारत..
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भुगतान संतुलन की प्रवुत्तियां और चुनौतियां
जोमोन मैथ्यू |
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भुगतान संतुलन (बीओपी)..
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आपदा प्रबंधन प्रयासों में आमूल परिवर्तन |
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प्राकृतिक और मानवनिर्मित आपदाएं प्रायः मौत का कारण बनती हैं और आजीविका का हास हौता हैं|
साथ ही संपत्ति, परिसंपत्तियों और आधारभूत संरचना का विनाश होता है|
आपदाओं के कारण असुरक्षित एवं वंचित वर्ग के लोगों के लिये खतरा बढ जाता है और आपदा-प्रभावित तथा आपदा-संभावित समुदायों में सामाजिक-मनोवैज्ञानिक तनाव और सदमा व्याप्त हो जाता है|
बाढ जैसी बारंबार आने वाली आपदाओं से आपदा-संभावित समुदाय संकट से जूझने के सामर्थ्य और शक्ति से हीन हो जाने के कारण विश्वास की कमी के शिकार हो जाते हैं|
ऐसा इसलिए होता है क्योंकि इनके अस्तित्व को ही खतरा पैदा हो जाता है और बार-बार महीनों तक उनका सामान्य जीवन बुरी तरह प्रभावित होता रहता है|
आपदाओं के अचानक आने से,विशेषकर तब जब विस्थापित लोग अस्थायी राहत शिविरों में शरण लेने के लिए विवश हों, बच्चों, शिशुओं और बुजुर्ग लोगों के प्रति उपेक्षा और अभाव का खतरा और अधिक बढ जाता है|
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