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| उदारीकरण का युग शुरू होने के पूर्व भारत .... |
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अग्र लेख
मुद्रास्फीति : पुनर्विचार मांगता प्रश्न कमल नयन काबरा
अन्य सभी क्षेत्रों की तरह ही .....
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मुद्रास्फीति : पुनर्विचार मांगता प्रश्न कमल नयन काबरा |
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अन्य सभी क्षेत्रों की तरह ही अर्थ...
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नितियों को मुद्रास्फीति की चुनौती शशांक भिङे |
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मुद्रास्फीति की ऊंची दर उपभोक्ताओं...
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भारत में मुद्रास्फीति के प्रकरण मानस भट्टाचार्य |
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भारत में परंपरा से मुद्रास्फीति ...
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मुद्रास्फीति और अर्थव्यवस्था की स्थिति के.आर.सुदामन |
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मुद्रास्फीति ऐसी स्थिति है जिससे...
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मुद्रास्फीति : मिथक, वास्तविकता एवं नीतिगत एजेंडा
वी. षण्णमुखम देबज्योति डे |
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भारत में तेज़ी से बढ़ रही महंगाई, वैसे ...
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असंगठित क्षेत्र की छतरी |
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यह कितनी बड़ी बिडंबना है कि देश के सकल घरेलु उत्पाद में 63 प्रतिशत का योगदान करने वाले मजदूर मौजूदा दौर में जिंदगी की आम ज़रूरतों और सहूलियतों से महरूम हैं| राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षंण चार साल पहले यानी सन् 2004-2005 में हुआ था| इस सर्वेक्षंण के मुताबिक उस वक्त कुल 45.9 करोड़ लोगों को रोजगार मिला हुआ था,जिसमें संगठित क्षेत्र में महज 2.6 करोड़ लोग ही नौकरियां कर रहे थे,जबकि उम्मीद से भी कहीं ज्यादा यानि करीब 43.3 करोड़ लोग असंगठित क्षेत्र की नौकरियों के ज़रिये अपनी ज़िदगी की गाड़ी खींच रहे थे| चार साल बीतने के बावजूद संगठित क्षेत्र और असंगठित क्षेत्र के इस विरोधाभासी संतुलन में कोई अंतर नहीं आया है| बल्कि आज आर्थि मंदी के दौर में जिस तरह नौकरियों पर संक बन आया है, उससे साफ है कि असंतुलन और बड़ा ही होगा| देश के सकल घरेलु उत्पाद में असंगठित क्षेत्र के इस योगदान को खुद राज्यसभा में श्रम मंत्री आँस्कर फर्नांडिस भी स्वीकार कर चुके हैं|
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