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अनंत काल से, एक - दूसरे से दूर देशों और यहां तक किमहाद्वीपों
के बीच वस्तुओं के आदान -प्रदान तथा व्यापार के जरिये समाजों ने समृद्धि
हासिल की है| आज भूमंडलीकरण के युग में अंतरराष्ट्रीय व्यापार और आदान - प्रदान अनिवार्य -सा हो गया है|बिभिन्न
देश अपने उत्पादों का निर्यात बढ़ाकर और आयत घटाकर अपने नागरिकों की समृद्धि
के लिए काम कर रहे है| परंतु विशव की उभरती अर्थव्यवस्था होने के बावजूद भारत का विदेश व्यापार परिदृश्य कोई विशेष उत्साहजनक नहीं है|
विशव व्यापार में भारत का योगदान अभी भी बहुत कम है| सकल घरेलू उत्पाद के लिहाज से विशव की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाले भारत का स्थान वस्तु निर्यात के क्षेत्र में बीसवां और आयत के क्षेत्र में तेरहवां है, जबकि विशव निर्यात में इसका अंश केवल १.४४ प्रतिशत है और आयात में इसका योगदान कुल २.१२ प्रतिशत है| अधिक आयात और कम निर्यात से व्यापार संतुलन ऋणात्मक हो जाता है|
इससे देश के बहुमूल्य संसाधन बाहर चले जाते है| और उनसे होने वाली आय कोई विशेष आकर्षक नहीं होती| इसलिए आर्थिक विकास को गति देने के लिए विदेश व्यापार के ऋणात्मक संतुलन को उलटने की आवश्यकता है| इसके लिए विनिर्माण क्षेत्र को सुदृढ़ बनाने की आवश्यकता है क्योंकि देश में बने उच्च गुणवत्ता
के विनिर्मित उत्पादों के निर्यात से ही विदेश व्यापार में संतुलन आ सकता है|
इसके लिए आवश्यक है उत्पादों का अंतरराष्ट्रीय स्पर्धा में ठहरना| इसी से निर्मित वस्तुओं का निर्यात बढ़ेगा और आयत में कमी आएगी| भारत की व्यापार निति में निर्यात पर खासतौर पर ध्यान दिया गया है| देश के आर्थिक विकास में इसकी मुख्य भूमिका है|
विदेशी निवेशकों को भारत में निर्यातोन्मुखी उधोग लगाने के लिए आकर्षित करने पर विशेष बल देना होगा| आज भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने आकार के अनुसार विशव व्यापार में अपना स्थान बनाना है|
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