अंक : July 2015
  भारत-अमेरिका संबंधः उभरती साझेदारियां
-के.सी.सिंह
  भारत और अमेरिका के लिए चुनौती होगी कि वे अतीत में गंवा दिए गए मौकों की भरपाई आने वाले दशक में कर लें। हालांकि सभी देश . ..
  भारत और चीन संबंध- बदलते रिश्ते
- मनीष चंद
  सांझी लोकप्रिय संस्कृति एशिया की दो उभरती हुई शक्तियों वेफ बीच में एक शक्तिशाली सूत्र और सेतु निर्माता के रूप में स्थापित हुई है जो आपस में ....
  आर्थिक विकास के लिए राजनय
राम उपेंद्र दास
  **मेक इन इंडिया** ऐसा कार्यक्रम है, जो घरेलू माना जाता है, लेकिन निश्चित रूप से जिसके बाहरी....
  रक्षा समझौतेः अंतर्राष्ट्रीय संबंध के वाहक
आलोक बंसल
  दुनिया के विभिन्न देशों के साथ भारत के रक्षा सहयोग में काफी विस्तार हुआ है। यह उज्जवल भविष्य से ...
  बहुपक्षीयता और क्षेत्रीय सहयोगः कुछ प्रश्न
दिलीप सिन्हा
  भूमंडलीकरण के बाद की दुनिया एक छोटी सी जगह प्रतीक होती है, जहां आप एक दूसरे के विकास ..
संपादकीय
 
 

उदीयमान भारत ...

अंतर्राष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ कहते हैं कि किसी राष्ट्र के कद और भाग्य को सैन्य शक्ति से भी अधिक राजनयिक मोर्चे पर उसकी सफलता तैयार करती है। भारत के संबंध में यह बयान और भी अधिक सत्य है। एक ओर राष्ट्र के रूप में हमारी देशभक्ति की भावना की सभी सराहना करते हैं। तो दूसरी ओर शांतिप्रिय देश के रूप में भारत की अंतर्राष्ट्रीय छवि भी बहुत निखरी है। साथ ही हमने सीमाओं की रक्षा करने वाले अपने जवानों का हमेशा अभिनंदन किया है। लेकिन राजनयिक मोर्चों पर भारत की उपलब्धियों की ओर हाल तक उतना ध्यान नहीं दिया गया। जितना दिया जाना चाहिए था। अब एक स्वागत योग्य परिवर्तन हो रहा है। मुख्यधारा का मीडिया तो पर्याप्त कवरेज दे ही रहा है। आम आदमी ने भी भारतीय राजनय की सफलता की गाथा पर ध्यान देना आरंभ कर दिया है। हालांकि वे कूटनीतिक शब्दों और वाक्यों की जटिलता नहीं समझते, लेकिन वे कूटनीतिक प्रयासों तथा राष्ट्र निर्माण में इसमें निहित लाभों को महसूस करते हैं और सराहना करते हैं।

उदारीकरण एवं विश्व व्यापार में तेजी से बदलते रुझानों ने भारत के अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में बहुत परिवर्तन किया है। स्वयं पर बहुत अधिक वेंफद्रित रहने वाली अर्थव्यवस्था से इसे वैश्विक रूप से एकीकृत अर्थव्यवस्था में बदलने के सफल प्रयासों ने अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भारत की छवि पर सकारात्मक प्रभाव डाला है। पिछला एक वर्ष हमारे राजनयिक प्रयासों को वैश्विक सराहना मिलने का साक्षी रहा है। भारतीय राजनय ने बेहद सतर्कता अथवा संभले कदमों से सशक्त एवं सक्रिय कदमों तक की बड़ी छलांग लगाई है। यह सब तब आरंभ हुआ, जब प्रधानमंत्री ने अपने शपथ ग्रहण समारोह में दक्षेस राष्ट्रों के प्रमुखों को आमंत्रित किया। विशेषज्ञों ने उसे कूटनीतिक तख्तापलट बताया। एक वर्ष की छोटी सी अवधि में ही प्रधानमंत्री की उन्नीस विकसित एवं विकासशील देशों की यात्रा ने हमारे विदेश संबंधों के लिए संभावनाओं के नए द्वार खोल दिए। यह वर्ष भारत द्वारा अपने पड़ोसी और उनके पड़ोसियों को प्राथमिकता दिए जाने का साक्षी बना। हमने विश्व की सभी प्रमुख शक्तियों के साथ अपने रणनीतिक संबंध और मजबूत किए हैं। भूकंप से तबाह नेपाल में फौरन बचाव तथा राहत कार्य सुनिश्चित करने में भारत की सक्रियता पर दुनिया भर का ध्यान गया। कई वर्षों से संयुक्त राष्ट्र शांति रक्षा अभियान में हमनें दुनिया में सबसे अधिक योगदान किया है।

दुनिया में दूसरे सबसे बड़े समुदाय के रूप में भारतीयों की उपस्थिति ने अन्य देशों के साथ भारत के संबंधों को वांछित रूप से प्रोत्साहन दिया है। हाल के रुझान बताते हैं कि अब तक निष्क्रिय रहे देशों ने भी भारत के साथ संबंध मजबूत करने में बहुत रुचि प्रदर्शित की है। दुनिया में भारतीयों का सबसे बड़ा उच्च कौशल युक्त समूह होने के कारण कोई भी देश भारत को नज़रअंदाज नहीं कर सकता। जो दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और चीन को भी पछाड़ते हुए सबसे तेज विकास करने वाली अर्थव्यवस्था है।

आर्थिक क्षेत्र, मानव संसाधन विकास एवं अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में भारत की प्रगति ने दुनिया को उस बात पर ध्यान देने के लिए विवश कर दिया है, जो हम एक राष्ट्र के रूप में कहते हैं। प्रधानमंत्री के आह्वान के बाद संयुक्त राष्ट्र ने 21 जून 2015 को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के रूप में मनाने का प्रस्ताव पारित किया। इसके साथ ही इसने अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की ओर से चुनौतीपूर्ण मांगों को और भी बढ़ा दिया है। किंतु भारत सतत प्रयासों और नीतिगत पहलों से इन चुनौतियों को पूरा करने में सफल रहा है। 1947 से 2015 तक लगातार सशक्त होते हुए भारत ने अपना भाग्य रचा है और राष्ट्रमंडल में न्यायोचित स्थान प्राप्त किया है। हम आशा रखें कि वह दिन दूर नहीं, जब भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बन जाएगा, जो उसे बहुत पहले बन जाना चाहिए था।

 

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भारत और पड़ोसः नई आशाएं, नई दिशाएं
अचल मल्होत्रा
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किसी ने ठीक ही कहा है कि दुनिया की शुरुआत घर से होती है। व्यक्ति से परिवार, परिवार से पास-पड़ोस, पास-पड़ोस से समाज, समाज से राष्ट्र और राष्ट्र से विश्व की ओर संबंधों का विस्तार होता है। भारत की विदेश नीति भी इसी आधार पर काम करती दिख रही है। प्रधानमंत्री के शपथ ग्रहण में दक्षेस देशों के शासनाध्यक्षों को आमंत्राण, सत्ता संभालने के तुरंत बाद भूटान से विदेश यात्राओं की शुरुआत, आगे चलकर नेपाल व बांग्लादेश के साथ ऐतिहासिक समझौते आदि संकेत देते हैं कि भारत अपनी दुनिया की शुरुआत अपने पड़ोस से करना चाहता है और यह वक्त की मांग भी है 2014 के संसदीय चुनावों के बाद नई दिल्ली में सशक्त और स्थिर सरकार के उदय ने पड़ोसी देशों सहित अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को यह संकेत दिया कि भारत कोगंभीरता से लेने का वक्त अब आ चुका है। अंतर्राष्ट्रीय मामलों के प्रति अपनी व्यक्तिगत प्रतिबद्धता व्यक्त करते हुए प्रधानमंत्री ने पिछले एक साल में दिल्ली में कई महत्वपूर्ण नेताओं की मेजबानी करने के अलावा, करीब डेढ़ दर्जन देशों की यात्राएं भी कीं। इस प्रक्रिया में उन्होंने द्विपक्षीय या क्षेत्रीय अथवा बहुपक्षीय प्रारूप में दुनिया भर के सभी महत्वपूर्ण नेताओं से मुलाकात की और उनके साथ विचार-विमर्श किया। सरकार के राजनयिक प्रयासों से यह अब तक बिल्कुल स्पष्ट हो चुका है कि वर्तमान सरकार की विदेश नीति संबंधी प्राथमिकताओं में ‘सबसे पहले पड़ोस को बहुत ज्यादा अहमियत दी गई है। पड़ोसी देशों तक पहुंच बनाने की दिशा में पहला कदम तो प्रधानमंत्री के औपचारिक तौर पर पदासीन होने से पहले ही उठा लिया गया था। पिछले साल 26 मई को प्रधानमंत्री के शपथ ग्रहण समारोह में भाग लेने के लिए दक्षेस के सदस्य देशों के राष्ट्राध्यक्षों एवं शासनाध्यक्षों को आमंत्रित किया गया। इस निमंत्रण को उपयुक्त रूप से मास्टरस्ट्रोक और साहसी कदम करार दिया गया और इससे एक स्पष्ट संकेत गया कि भारत की नई सरकार दक्षिण एशिया में अपने पड़ोसियों के साथ संबंधों एवं क्षेत्र की अखंडता को बेहद महत्व देती है। शपथ ग्रहण समारोह में क्षेत्र के सभी राष्ट्राध्यक्षों एवं शासनाध्यक्षों की उपस्थिति ने इस बात की पुष्टि की कि वे भी भारत की भावना का उसी के अंदाज में प्रत्युत्तर देने की मंशा रखते हैं। इस अवसर ने शुरुआती संपर्क स्थापित करने का बेहतरीन मौका दिया, इसके बाद यात्राओं के आदान प्रदान अथवा क्षेत्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों से इतर बैठकों का दौर प्रारंभ हो गया। कार्यकाल के प्रथम वर्ष के दौरान प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं में सात सदस्यीय दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संघ (दक्षेस) के चार देशों (भूटान नेपाल श्रीलंका और बांग्लादेश) और चीन की यात्रा शामिल रही। राजनीतिक सुरक्षा और सामरिक परिस्थितियों की वजह से दक्षेस के शेष तीन सदस्य देशों (अफगानिस्तान पाकिस्तान और मालदीव) की यात्राओं का कार्यक्रम बनाने में कुछ वक्त लग सकता है। इस बीच अफगान राष्ट्रपति इस साल अप्रैल में भारत की यात्रा पर आए थे और भारतीय प्रधानमंत्री ने अपने शपथ ग्रहण समारोह के दौरान नई दिल्ली में पाकिस्तान और मालदीव के प्रधानमंत्रियों से मुलाकात की थी। संक्षेप में कहें तो एक वर्ष के दौरान प्रधानमंत्री ने पास-पड़ोस के समस्त नेताओं के साथ कम से कम एक बार मुलाकात की और कुछ के साथ तो एक से ज्यादा बार भी मुलाकात की।


 

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Last updated: Wednesday, July 01, 2009