अंक: October 2014
  भारतीय असंगठित अर्थव्यवस्था की भूमिका
बारबरा हैरिस व्हाइट
  अपनी असंगठित...
  अनौपचारिक क्षेत्रा और लोकविद्या
अमित बसोले
  असंगठित क्षेत्र के...
  उद्दीयमिता को प्रोत्साहन के साथ आर्थिक सामवेशन
शिशिर कुमार
  सरकारी अधिकारी...
  आर्थिक समावेशन की राहः प्रधानमंत्री जन धन योजना
प्रभाकर साहू
  भारत में...
  गांधीजी और स्वच्छता
सुदर्शन अय्यंगार
  गुजरात विद्यापीठ के...
संपादकीय
 
 

भारत निर्माता के प्रतिै

सबेरे सबेरे दरवाज़े की घंटी बजती है। अखबार वाला अखबार फेंकते हुए तेज़ी से निकल जाता है । हम जल्दी जल्दी तयार और अपने अपने कार्यालय , कारखाने या दुकान जाने के लिए रिक्शा, ऑटो या बस पकड़ने निकल जाते हैं । कार्यस्थल पर पहुंचकर हम पाते हैं कि चौकीदार सम्मानपूर्वक कार्यस्थल सुरक्षा में लगा सफाईकर्मी भी अपने कार्यों का बखूबी रहे हैं । एक ठेठ सरकारी कार्यालय में हम अपने साथ करने वाले निजी स्टाफ और सहयोगियों से मिलते हैं । इन सभी तरह से कामगारों, अखबारवाला, ऑटो ड्राइवर , रिक्शेवाला , चौकीदार , अर्दलियों, सफाईकर्मियों, कंप्यूटर संचालकों के बीच एक समानता है और वह है इन सभी का असंगठित क्षेत्र से संबंध होना । सही मायने में , चाहे वह संबंधित हो या फिर जीवन से जुड़ा कोई पक्ष हो , असंगठित क्षेत्र हमारी सबसे बड़ी सचाई है । हालांकि अपनी संरचना में बहुआयामी इस सेक्टर के महत्व को हम नज़रअंदाज़ करते हैं और कमतर आंकते हैं ।

 

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भारतीय असंगठित अर्थव्यवस्था की भूमिका
बारबरा हैरिस व्हाइट

अपनी असंगठित अर्थव्यवस्था के आकार और महत्व के हिसाब से भारत पूरे विश्व में संभवतः अद्वितीय है। जहां एक ओर इस सिद्धांत की अकादमिक जगत में कापफी आलोचना हुई है कि असंगठित होने का संदर्भ उस विशाल पैमाने पर चल रही अपंजीकृत गतिविधियों की वास्तविकता से है (सुंदरेशन, 2013) जो न तो राज्य के नियंत्राण में होते हैं और न ही तदनुरूप उसकी विधियों के नियंत्राण में, वहीं जनसामान्य में इसे बखूबी समझा जाता है और इस कारण इसमें सै सैद्धांतिक तौर पर इतनी गहराई है कि नियोजकों का ध्यान इस विषय पर जाए।

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Last updated: Wednesday, July 01, 2009