अंक : जनवरी 2015
  शिक्षा का वित्तीय प्रबंधन
जे.बी.जी. तिलक
  शिक्षा के वित्तीय प्रबंधन की कम से कम 10-20 वर्ष की योजना को विकसित करने की आवश्यकता है, जो देश में शिक्षा के विकास की दीर्घकालीन योजना के अनुरूप हो, शिक्षा के वित्तीय प्रबंधन के युक्तियुक्त सिद्धांतों पर आधारित हो। समुचित, सक्षम
  शिक्षा में प्रौद्योगिकीः अधीर पीढ़ी की आशाएं एवं आकांक्षाएं
राजाराम एस. शर्मा
  प्रौद्योगिकी का जैसे-जैसे विकास हो रहा है, वैसे-वैसे जीवन के सभी क्षेत्रों में इसकी उपयोगिता और अनिवार्यता बढ़ती जा रही है।
  एक मूल्य आधारित समाज के प्रतिः साहचर्य की शिक्षा
जे. एस. राजपूत
  ''यदि ज्ञान केवल ज्ञान ही रह जाए तो व्यक्ति के पास जीने की कोई उम्मीद नहीं रह जाती लेकिन यदि वह ज्ञान को बुद्धि में बदल दे तो न केवल वह जीवित रहेगा बल्कि उपलब्धियों की नई से नई ऊंचाइयों को प्राप्त करने के योग्य हो जाएगा''
  भारतीय शिक्षाःअतीत, वर्तमान और भविष्य
पवन कुमार शर्मा
  भारतीय शिक्षा के अतीत पर जब हम दृष्टिपात करते हैं तो यह समझ में आता है कि शिक्षा का दायित्व प्रायः समाज के द्वारा ही निर्वहन किया जाता था, कुछेक विषयों को छोड़कर
  जलवायु परिवर्तनः संकट में मानव स्वास्थ्य
आशुतोष कुमार सिंह
  जलवायु परिवर्तन का सबसे बुरा असर एशिया के क्षेत्रों पर पड़ेगा क्योंकि ज्यादातर देशों की अर्थव्यवस्था कृषि व प्राकृतिक
संपादकीय
 
 

परिवर्तन के लिए शिक्षा

   यह प्रसिद्ध उक्ति बताती है कि शिक्षा का कितना अधिक महत्व है। हमारे देश के संदर्भ में यह बात और भी सच है। एक युवा लोकतंत्र के तौर पर भारत शिक्षा के मोर्चे पर बहुत तेजी से प्रगति कर रहा है। राष्ट्र की बुनियाद रखने वालों ने शैक्षिक विकास को पर्याप्त महत्व प्रदान कर जो दूरदर्शिता दिखाई थी, उसका भरपूर लाभ हमें मिला है। शिक्षा का भारत में ऐतिहासिक रूप से ही महत्वपूर्ण स्थान रहा है। प्राचीन भारत में पुरोहित वर्ग ज्ञान प्राप्त करने के लिए अध्ययन करता था, जबकि क्षत्रिय एवं वैश्य विशिष्ट उद्देश्यों के लिए जैसे विमान, युद्धकला अथवा व्यापार सीखने के लिए अध्ययन करते थे। प्राचीन शिक्षा प्रणालियों का उद्देश्य जीविकोपार्जन था। विदेशों से उच्च शिक्षा हेतु आने वाले छात्रों के लिए भी भारत शीर्ष स्थल था। सबसे बड़े शिक्षा केंद्रों में से एक नालंदा में ज्ञान की सभी शाखाएं थीं और अपने चरमोत्कर्ष काल में उसमें 10,000 तक छात्र रहते थे।

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भारत में स्कूली शिक्षा का कायाकल्पः नीतिगत मुद्दे तथा प्राथमिकताएं

आर. गोविंदा
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नई शिक्षा नीति को साथ अध्ययन करना और साथ रहना सिखाने वाले मूल्यों एवं आचरण वाली दुनिया की कल्पना करनी होगी। यदि ऐसी नीति केवल बातों के लिए नहीं होनी है बल्कि उसे स्थायी होना है तो उसे सांस्कृतिक, भाषाई और आर्थिक संदर्भ में व्यापक विविधता वाले इस देश में रहने वाले लोगों के साझे मूल्यों एवं अनुभवों पर आधारित होना चाहिए। वास्तव में पूरे देश में शिक्षा में अभूतपूर्व वृद्धि हो रही है, जो भविष्य के आशा का भाव जगाती है। आशा एवं आकांक्षा के इसी भाव को भविष्य की नीति का आधार बनाना होगा.

उपनिवेशिक अतीत से विरासत में मिली कुलीनतावादी शिक्षा व्यवस्था को जनसमान्यवादी एवं समानता तथा सामाजिक न्याय के सिद्धांतों पर आधारित शिक्षा व्यवस्था में बदलने का कार्य आरंभ किए भारत को छह दशक से अधिक बीत चुके हैं।


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Last updated: Wednesday, July 01, 2009