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सीमित संसाधन और दीर्धकालिक विकास का खाका
कमल नयन काबरा |
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अगले वर्ष का केंद्र सरकार का बजट एक बार फिर आर्थिक वृद्धिदर को एक ऊंचे स्तर पर लाने को अपना सर्वप्रमुख सरोकार बताता है|
पिछले चार साल मंदी और महंगाई के जाल में फंसी अर्थव्यवस्था को रप्तार और स्थायित्व देने में लगाये गए थे २०१२-१३
के बजट के बाद उम्मीद की गई है कि अब फिर से आर्थिक बढ़त- दर को ७.६ प्रतिशत और बाद में ज्यादा बढ़ाया जाएगा और इस गति को बढ़ाने की जमीन वजूद द्वारा तैयार की जा सकेगी |
महंगाई के खतरे को कम करके आंका जा रहा है | इस घोषित प्राथमिकता के बावजूद हमारी जटिल और विविधतामय विशाल अर्थव्यवस्था में सरकार को कई
दूसरे सवालों से भी जुक्षना पड़ता है |
साथ ही स्वयं राज्य के अपने वित्त प्रबंधन पर भी इन बहुमुखी कठिनाइयों का
साया पड़ता है| इन राजकीय समस्याओं का निचोड़ इन दिनों राजकोषीय घाटे के रूप में देखा-परखा और निपटाया
जाने लगा है |
इस साल की आर्थिक वृद्धिदर में गिरावट, कर -उगाही में कमी, खर्चो में वृद्धि, विनिवेश से उगाही
में पूंजी बाज़ार की सुस्ती के कारण कमी, महंगाई के कारण खर्च तथा महंगाई भत्ते में बढ़ोतरी आदि के
कारण राजकोषीय घाटा उदारीकरण के दौरान स्वीकृत मानदंडों के अनुकूल नहीं रह पाया है| |
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