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वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी को अपना सातवां बजट पेश करते समय देश की अर्थव्यवस्था के सामने खड़ी चुनौतियों का पूरा अंदाजा था |
अपने बजट भाषण में उन्होंने इन चुनौतियों का उल्लेख भी किया| लेकिन बजट देखकर ऐसा लगता है की वह इनचुनौतियों से निपटने के तरीके और उपायों को लेकर किसी दुविधा में फसें रहे |
कमरतोड़ महंगाई, अर्थव्यवस्था की गिरती हुई विकास दर,वित्तीय घाटा, घटता निवेश आदि सच्चाईयौं के मददेनज़र प्रस्तुत बजट में समाधान ढूँढना मुश्किल लगता है|बीमार भारतीय अर्थव्यवस्था के उपर्युक्त लक्षणों से निबटना मौजूदा परिस्थतियों में शायद किसी भी वित्तमंत्री के लिए आसान नहीं है |
हाल के विधान सभा चुनावों के नतीजों के मददेनज़र वित्तमंत्रीकेसामने मध्यमार्गी राह चुनने केअलावा और कोई चारा भी तो नहीं | इसलिए प्रणव मुखर्जी ने सेवा कर तथा उत्पाद शुल्क लगाकर बजट में वित्तीय घाटा कम करने की कोशिश की है |
मौजूदा बजट में उनकी रणनीति यही दिखती है की घाटे को नियंत्रित कर रिजर्व बैंक के लिए ब्याज दरों में कटौती की गुंजाइश बनाई जाए ताकि नीजी निवेश में बढ़ोतरी हो और अर्थव्यवस्था पटरी पर लौट सके|
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