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सात साल पहले तत्कालीन वित्तमंत्री पी.चिदंबरम ने समावेशी विकासकेजरिये ग्रामीण और पिछड़े भारत को नया तोहपादेने की घोषणा की थी| उसी के आसपास उन्होंने खर्च का हिसाब-किताब रखने के लिए व्यय बजट देने की बात भीकही थी |
अब यह कहना तो ठीक नहीं होगा की खर्च के बजट की तरह समावेशी विकास की बातभी भुला दी गई लेकिन साल
-दर-साल इस शब्द का रट्टा लगने के बाद भी ग्रामीण भारत,खेती-बाड़ी,पशुपालन और सामाजिक विकास जैसे क्षेत्रों में भारी कमी है |
इस बार के बजट में भी यह क्षेत्र उपेक्षित ही रहा है|कहना ना होगा की यूपीए सरकार कीप्रथामिकताओं में नरेगा, शिक्षा का अधिकार, भोजन का अधिकार और सामाजिक क्षेत्र के लिए चलने वाली सात बड़ी योजनाएं रही है फिर भी बजट देखकर नहीं लगता की सरकार में अब इन सबको लेकर कोई बहुत उत्साह बचा हुआ है |
असल में विशव बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसी जिन संस्थाओं की देखरेख में भूमंडलीकरण का अभियान चल रहा हैउनके यहांभी इनसे होने वाले नुकसानों की चिंता हुईऔर नीतियों को बदलने कीतरह नुकसानों को खूबसूरत लफ्जों सेढकदेने काम किया गया | हर विकास परियोजनासेहोनेवाले विस्थापनों को देखते हुए परियोजना में ही पुनर्वास का कार्यक्रम भी जोड़ दिया गया|
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