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बाल मजदूरी जीवन का सबसे बडा अभिशाप है | देश के भावी कर्णधार मजदूरी में अपने बचपन की खुशियों को गिरवी रख देते हैं |जिन बच्चों के हाथों में खिलौने ,कागज - कलम , कापी - किताब ,स्लेट - पेंसिल होनी चाहिए थी , उन नाजुक हाथों में औरों के जूते पालिश करने के ब्रश , दूसरों के पढने के लिए स्लेट - निर्माण की सामग्रियां ,पत्थर तोडने के हथौडे अथवा द्री - कालीन बुनने के लिए धागों का जाल होता है ,जिसके मकडजाल में उनकी जिंदगी पिसती रहती है |
जिन बच्चों को मां - बाप की गोद में होना चाहिए था या भाई - बहन की बांहो में जिनको दुलार मिलना चाहिए था , वे भयंकर शीतलहरी, तपती दोपहरी या घनघोर वर्षो के थपेड़ो या जलती भटठियों केशिकार होते हैं | वे मिटटी के दीये या मोमबत्ती जलाकर दीवाली नहीं मनाते बल्कि अपना बचपन सुलगाकर, उंगलियां जलाकर अमीर बच्चों की दीवाली के उत्सव के लिए पटाखे या मोमबत्ती बनाते हैं|
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